Tuesday, May 17, 2011

अलविदा कहने से पहले

चलो बस्ती जल चुकी है अब यहाँ राख का ढेर है 
है नहीं मोहब्बत यहाँ लगता हैं  जैसे  गैर  है
क्यूँ रोकते हो तुम मुझे जब रोकना नहीं चाहते
क्यूँ देते तसल्ली जब हो दर्द देना चाहते

क्यूँ तू ऐ नासमझ दिल अब भी है रुकना चाहता
क्या तुझे इस रौशनी के परे अँधेरा नज़र नहीं आता 
हाँ यह रौशनी उस आग की जो जला रही है तेरा घर
क्यूँ नहीं समझता क्यूँ तू है खंडहर में रहना चाहता

हाँ  मैंने  देख  लिया  है  अश्को  को  आँखों  में  तैरते  हुए
मगर  में  आगे  बाद  के उसके  अश्को  को  पूछना  नहीं  चाहता
हाँ  वोह  मोहब्बत  तोह  करती  है  भरोसा  नहीं  करती
मगर  में  सफाई  दे  के  दिल  को  दुखाना  नहीं  चाहता

मत  समझो  मुझे  इतना  भी  कमज़र्फ 
की  उसे  रुसवा  करूंगा  जाने  से  पहले
बस  एक  हसरत  चाहता  हूँ  में  उससे
मुझे  बाहों  में  भर  लो  अलविदा  कहने  से  पहले

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